समाजोपयोगी कहानी: एकता की शक्ति

समाजोपयोगी कहानी: एकता की शक्ति एक चूहा कसाई के घर में बिल बना

समाजोपयोगी कहानी: एकता की शक्ति

एक चूहा कसाई के घर में बिल बनाकर रहता था। एक दिन उसने देखा कि कसाई और उसकी पत्नी थैले से कुछ निकाल रहे हैं। उत्सुकता से झाँकने पर उसने पाया कि वह एक चूहेदानी थी। खतरा भाँपकर चूहे ने यह बात पिछवाड़े में जाकर कबूतर को बताई। कबूतर ने हँसते हुए कहा, “यह मेरी समस्या नहीं है।”

निराश चूहा मुर्गे के पास गया। मुर्गे ने भी उपेक्षा करते हुए कहा, “भाई, यह तेरी चिंता हो सकती है, मेरी नहीं।” हताश चूहा बकरे के पास पहुँचा, लेकिन बकरा हँसते-हँसते लोटपोट हो गया।

उसी रात चूहेदानी में खटाक की आवाज़ हुई। उसमें एक ज़हरीला साँप फँस गया था। अंधेरे में उसकी पूँछ को चूहा समझकर कसाई की पत्नी ने जैसे ही निकाला, साँप ने उसे डस लिया। तबीयत बिगड़ने पर हकीम को बुलाया गया, जिसने इलाज के लिए कबूतर का सूप पिलाने की सलाह दी। अब कबूतर पतीले में था।

कसाई की पत्नी के ठीक होने तक कई रिश्तेदार मिलने आए। उनके भोजन के लिए अगले दिन मुर्गे को काटा गया। कुछ दिनों बाद, जब वह पूरी तरह स्वस्थ हो गई, तो खुशी में दावत रखी गई, और उस दिन बकरे की बलि चढ़ा दी गई।

इस पूरे घटनाक्रम में केवल चूहा ही बचा, जो बहुत दूर चला गया था।

शिक्षा:
इस कहानी से हमें यह सीख मिलती है कि समाज का कोई भी संकट किसी एक व्यक्ति या वर्ग की समस्या नहीं होती, बल्कि धीरे-धीरे पूरे समाज को प्रभावित करती है। जब कोई अन्याय या संकट खड़ा हो, तो यह सोचकर न टालें कि यह केवल दूसरों की समस्या है । एक संगठित और जागरूक समाज ही अपने अधिकारों की रक्षा कर सकता है।

समाज के उत्थान के लिए आवश्यक कदम:

संगठित हों, शिक्षित हों और एक-दूसरे की समस्याओं को समझें।

अन्याय के खिलाफ एकजुट होकर आवाज़ उठाएँ।

समाज की उन्नति के लिए व्यक्तिगत स्वार्थ से ऊपर उठें।

“यदि आज हम किसी अन्याय को अनदेखा करेंगे, तो कल वह अन्याय हमारे दरवाजे तक भी आ सकता है।”

सादर,

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